पितृसत्तात्मक समाज या नारीवादी मानसिकता – दोनों ही पुरुष विरोधी?

| January 26, 2015

भारतीय समाज को पितृसतात्मक समाज कहा जाता है और साथ ही भारत में नारी को देवी का स्थान दिया जाता है। दोनों ही बातों में विरोधाभास है या तो समाज पितृसतात्मक है या फिर नारी को देवी की तरह पूजा जाता है। जहाँ तक मेरा अनुभव रहा है पितृसतात्मक तो नहीं परन्तु भारतीय समाज नारीवादी ज़रूर है। इसकी गवाही स्वयं इतिहास भी देता है, की भारतीय समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान ही सम्मान और स्वायत्ता प्राप्त थी। हमारे धर्म ग्रंथों में नारी को पुरुष से भी उच्चत्तम स्थान दिया गया है और उसको ही जीवन की उत्त्पत्ति का स्त्रोत कहा गया है। यहाँ तक की नारी को शक्ति का स्वरुप माना गया है जो पुरुष को शसक्तीकरण प्रदान करती है।

दुर्भाग्य की बात है कि आज के समय में उसी नारी को ना जाने क्यों शक्तिहीन दिखा कर उसके हितों की रक्षा के नाम पर व्यवसाय किया जा रहा है। आज कुछ तुच्छ मानसिकताओं वाले महिलाओं के अधिकारों के अधिवक्ताओं को सुनता हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो उन्होंने भारतीय इतिहास को या तो अपने अनुसार बदल दिया है या फिर भारतीय इतिहास को उन्होंने ही लिखा है।

अब यह आलाप सामान्य हो गया है, जो रोज ही किसी न किसी समाचार पत्र में या फिर किसी न किसी नेता के शब्दों में आ जाता है, की सदियों से नारी पर अत्याचार हो रहा है। हर उस झूठ की तरह जो शोर मचा कर सच में बदला जाता है इस आधारहीन झूठ को सच बना दिया गया है कि नारी पर सदियों से अत्याचार हो रहा है और पुरुष उसके लिए दोषी है या पितृसत्तात्मक समाज उसके लिए जिम्मेदार है। समझ में नहीं आता है कि उन धर्म ग्रंथों पर विश्वास किया जाय जो भारतीय नारी के शसक्तीकरण के गुणगान से भरी पड़ी हैं या इन नारीवादियों के झूठे और एकतरफा किये गए सर्वेक्षणों पर। इन नारिवाद्यों पर विश्वास किया भी क्यों जाये जबकि यह भी तथ्यात्मक सत्य है कि खुद भारत में नारीवाद की शुरुआत पुरुषों के द्वारा की गयी थी जिसमे काफ़ी समय बाद महिलायों से साथ दिया।

भारत में कभी पुरुष और नारी का भेद इतना घेहरा नहीं था जितना नारिवाद्यों दिखाना चाहते हैं। परन्तु आज के समय में नारीवादियों के जूठ आँख मूँद कर सच माने जाते हैं क्योंकि भारतीय भावनायों में जीवन जीते हैं। तथ्य और प्रमाणों से ज्यादा आवेश और आंसुओं पर विश्वास करते हैं। कुछ इस तरह के झूठ को केवल इसलिए सच मान लेते हैं क्योंकि एक महिला या उसका अधिवक्ता यह बोल रहा होता है। कुछ धर्म के इतने अनुयायी होते हैं की धर्म का या देश का नाम लेकर बोलो तो आँखों के सामने बन रहे झूठ को सच मान जाते हैं। इसी मानसकिता का दुरुपयोग कर या फिर यह कहा जाए की प्रयोग कर नारिवाद्यों के सारे व्यवसाय पनप रहे हैं।

अब तो यह समय आ गया है की भारतीय राजनीतिग्य भी इसी मानसीकता का प्रयोग कर संसद के गलियारों तक पहुँचने के प्रयास करते नज़र आते हैं और सफल भी होते हैं।

जो भी हो इन सब के चलते बेचारा पुरुष बिना कुछ करे ही रूढ़ प्रारूप का शिकार हो जाता है। उसको हमेशा की ही तरह झूठे शसक्तीकरण का आभास कराया जाता है। जो किसी आरोप से कम नहीं है या फिर यूं कहा जाये कि किसी पाप से कम नहीं है। पितृसत्तात्मक समाज़ का हवाला देकर जो सम्मान उसको सदियों से नहीं मिला वो भी उस से छीन लिया जाता है। इसका वर्तमान उधाह्र्ण भारत की सरकार द्वारा चलाये जा रहे जन कल्याण कार्यक्रमों से लिया जा सकता है| इन कार्यक्रमों में कहीं भी पुरुष के लिए कुछ भी नहीं है। परन्तु इन कार्यक्रमों का पूर्णतया क्रियान्वयन हो इसका उत्तरदायी पुरुष जरूर है, या उसको इन कार्यक्रमों की आवश्यकता का दोषी जरूर ठहरा दिया जाता है।  हाल ही में भारत सरकार ने “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नाम से एक नए कल्याणकारी कार्यक्रम का उद्घाटन किया है। जिसकी आवश्यकता भी पुरुष के वजूद के कारण ही मानी गयी है। चूँकि पितृसत्तात्मक समाज है, पुरुष बालक के जन्म की लालसा के चलते लड़कियों की उत्पत्ति में कमी हुई है, इसलिए इस कार्यक्रम की आवश्कता है। पुरुष को हमेशा की तरह कुछ नहीं दिया गया अपितु उसको इन परिस्थितियों के लिए दोषी ठहराना नारीवादी नहीं भूले।

मेरा सवाल है उन बुद्धिजीवी लिंग समानता के अधिवक्ताओं से की, क्यों नहीं कल्याणकारी कार्यक्रम लिंगभेदी न होकर सभी के लिए समान हों? क्यों समानता के लिए लड़ने वाले समानता का तर्क देकर लिंगभेद को बढ़ावा देने पर अमादा हैं? क्यों इन नेताओं के लिए समाज़ के उत्थान या कल्याण का अर्थ केवल नारी पर आकर ख़त्म हो जाता है?

अंत में इतना ही कि यदि लिंग समानता का नाम, झूठ के व्यवसाय जिसको नारीवाद भी कहा जा सकता है, को पनपने के लिए लिंग भेदी नीतियों को बढ़ावा देना है, तो में लैंगिक समानता का कट्टर विरोध करता हूँ।

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